Mahabharat greater message is not result of war but in the weakness shown during the war – बेबाक बोलः धर्म-अ-धर्म


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

श्रीमद्भगवदगीता मानव से कहती है कि तुम्हारा अधिकार कर्म में ही है, उसके फल में नहीं। और तुम्हारा साथ अकर्म में भी न हो, यानी यह सोचकर भी मत बैठ जाओ कि कर्म करने से क्या लाभ इसलिए कर्म को ही त्याग दूं।

कथा में कथ्य क्या है? किसी देश, काल और संस्कृति के साहित्यिक आख्यान का ध्येय उस समय को दिशा देना होता है। महाभारत जैसे महाकाव्य के कहन को आज हम फिर कैसे और क्यों कहें? कोई अपने साहित्य में परिवर्तन चाहता है तो कोई क्रांति। हमारे पास पंचतंत्र की कहानी है जिसका उद्देश्य मानव समुदाय को शिक्षित करना है। तुलसीदास ने स्वांत: सुखाय के लिए रामचरितमानस की रचना की। वैदिक साहित्य कइयों ने लिखा, समय के साथ उसका साहित्य बढ़ता गया। लिखित के पहले स्मृति परंपरा में देखेंगे तो वहां पर भी लगातार क्षेपक हैं। स्मृतियों से जुड़ते हुए उसका विकास होता है।

रामायण और महाभारत में भी आगे कथा जुड़ती चली गई है। पौराणिक परंपरा में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन का पुरुषार्थ माना गया, यानी मनुष्य को इन्हें हासिल करने का प्रयत्न करना चाहिए। महाभारत में यह सब है। लेकिन महाभारत की खासियत तो इस चार के पार चले जाना है। इसी कारण यह आज भी हमारे सामने खड़ा हो जाता है। किसी साहित्य के संदेश में समय और क्षेत्र का बहुत महत्व होता है। महाकाव्यात्मकता तभी हो पाती है जब उसकी प्रासंगिकता समयबद्ध न हो सके। शास्त्रीय रचना हर समय और क्षेत्र के साथ शास्त्रार्थ कर सकती है। महाभारत के चरित्र आज भी पुनर्भाषित हो रहे हैं। इसके किरदारों से आज भी सवाल-जवाब किए जा रहे हैं।

आज हम महाभारत को जिस उद्देश्य से देख रहे हैं जरूरी नहीं कि वेदव्यास ने भी उसी उद्देश्य से लिखा हो। सवाल है कि उद्देश्य को हम तलाश कहां पर रहे हैं? लिखे गए शब्दों में तलाश रहे हैं या लेखक में तलाश रहे हैं? या हम उसमें अपने लिए मौजूदा समय के मायने खोज रहे हैं। सिर्फ लिखे शब्दों को ही उद्देश्य मान लेने से पाठक की भूमिका सिकुड़ जाती है। महाभारत जैसे महाकाव्य की खासियत यही है कि इससे जुड़ने के साथ ही पाठक अपने समय और संदर्भों के साथ युद्धरत हो जाता है और नए अर्थ व संदर्भ बनाता है। यहीं से उसका उद्देश्य विस्तृत हो जाता है। कहा जाता है कि महाभारत की रचना समय के अलावा कौन कर सकता है। नए भारत को समयबद्ध करते हुए उसे नियमबद्ध करने के लिए, भरत के भारतवंश की संहिता का आधार तय किया गया। इस संहिता का आधार बना अपराध और दंड। इसमें कहा गया कि अपराध के कर्म का फल दंड है, क्षमा नहीं। लेकिन जैसा कर्म करेगा वैसा फल देगा भगवान वाले गीता-ज्ञान में विरोधाभास वहीं पैदा हो गया जहां पर यह दिया गया।
गीता का केंद्रीय संदेश है, बिना फल की चिंता किए कर्म करना। लेकिन ज्ञानदाता खुद ऐसा नहीं कर रहे हैं। वे अर्जुन को इस बात के लिए प्रेरित कर रहे हैं कि जो सामने खड़े हैं इनके कर्म अच्छे नहीं हैं, इसलिए इन्हें इसका दंड मिलना चाहिए, फल मिलना चाहिए। इनके कर्म बुरे हैं तो इनका वध होना चाहिए। कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन बीच में जाकर खड़े होते हैं तो उन्हें दूसरी तरफ पितामह, गुरु और भाई ही दिखते हैं। लेकिन गीता-ज्ञान के बाद वो सिर्फ कर्म के मोहरे हैं जिन्हें अर्जुन से दंडित होना है।

आज का समाज जिस आपराधिक दंड संहिता से नियमबद्ध है उसका आधार इस पौराणिक आख्यान में देख सकते हैं। कर्म के अनुपात में फल। बुरे कर्म वालों को माफी देने का मतलब है बाकियों को भी उस तरफ लेकर जाना। जब भरोसा हो जाएगा कि किसी की भी मर्यादा का हरण करने वाले को बाद में माफ कर दिया जाएगा तो फिर मर्यादा का ही अस्तित्व खत्म हो जाएगा। अगर आप तटस्थ रहेंगे और उसके बाद भी आपके मान-सम्मान पर कोई आंच नहीं आएगी तो कुछ भी कर निर्भय रहने की प्रवृत्ति ही आगे जाएगी। लेकिन गीता का ज्ञान देने वाले ने ही इसका विरोधाभासी रूप प्रस्तुत किया।

महाभारत का आख्यान शुरू होता है राजा भरत के लोकतांत्रिक स्वरूप से। जीवन का अर्थ जन्म नहीं कर्म को मानते हुए उन्होंने अपने पुत्रों में से किसी को भी अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया। राजा भरत खुद को प्रजा के पालक के रूप में देख रहे थे तो राज्य का वारिस भी उनके बीच में से एक को चुना। अपने पुत्र को ही सत्ता सौंपना प्रजा के साथ विश्वासघात होता। राजा भरत ने जो धर्मक्षेत्र बनाया वह शांतनु के आत्ममोह और आगे जाकर पुत्रमोह और भाई-भतीजावाद के कारण कुरुक्षेत्र बन गया। भरत के आदर्श के खिलाफ भरतवंश से मांग उठी कि राजा का बेटा ही राजा बनेगा। अब कर्म नहीं, जन्म ही राज और समाज के नियम तय कर रहा था। उसमें भी धृतराष्ट्र के जन्म के आधार को इसलिए कुचला गया क्योंकि वे नेत्रहीन थे। धृतराष्ट्र इसलिए नेत्रहीन पैदा हुए क्योंकि नियोग विधि के वक्त उनकी माता ने वेदव्यास के कठोर तप के कारण कठोर हुए चेहरे को देख डर के मारे आंखें बंद कर लीं थी। धृतराष्ट्र का जन्म अपनी मां की प्रकृति के अनुसार हुआ लेकिन ज्येष्ठ पुत्र होने के बावजूद उनकी इस प्राकृतिक कमी को स्वीकारा नहीं गया। यानी जन्म और कर्म दोनों के साथ सुविधाजनक तरीके से घालमेल कर कुरुक्षेत्र के मैदान का निर्माण शुरू हो गया था। धर्म और अधर्म का कोई स्पष्ट चेहरा नहीं था और दोनों अपने रूप बदल रहे थे।

धृतराष्ट्र को ग्लानि रही कि नेत्रहीनता के कारण उनके जन्म के अधिकार को छीना गया। अब वे अपने बेटे को राजा देखना चाहते थे। उनके इस पुत्र-मोह को अधर्म की संज्ञा दे जो धर्मक्षेत्र बनाया गया उसमें भरत के आदर्श का भारत नहीं बल्कि उसी सामंती सत्ता की स्थापना हुई कि राजा का बेटा राजा। धृतराष्ट्र की जगह पांडु पुत्रों के मोह और अधिकारों की स्थापना हुई।

महाभारत के युद्ध में जीत के बाद युधिष्ठिर महाराज बने और भीम युवराज, अर्जुन हस्तिनापुर की सीमाओं के प्रहरी। नकुल और सहदेव युधिष्ठिर के मुख्य अंगरक्षक बने। पांडु पुत्रों तक ही सत्ता सीमित कर भाई-भतीजावाद की मजबूत बुनियाद पड़ी। विदुर को महामंत्री बनाया गया जो हमेशा से पांडवों के साथ थे। यानी युद्ध के बाद आप उसी की स्थापना कर रहे थे, जिसे खत्म करने के लिए आपको बनाया गया था। भगवान के धरती पर अवतार का उद्देश्य ही धर्म की स्थापना करना था। लेकिन संदेश दिखा कि एक की पितृसत्ता की जगह आप दूसरी पितृसत्ता लाना चाहते थे। पांडु के पुत्रों के नैसर्गिक अधिकार को ही शुद्ध और धर्मसम्मत माना गया। महाभारत के कई प्रसंगों में भगवान कृष्ण धृतराष्ट्र के पुत्र-मोह को कोसते हैं। लेकिन वे उसके विकल्प में एक और मोह ही देते हैं।

महाभारत का वृहत्तर संदेश युद्ध के परिणाम में नहीं है। यह संदेश युद्ध के दौरान दिखाई गई निर्बलता में है, जिसे बलीभूत करने के लिए कृष्ण ने गीता का उपदेश दिया। महाभारत को हम इसलिए नहीं जानते हैं कि इसके द्वारा किसी सामंती सोच या सामाजिक बुराई को खत्म किया गया। कथा का कथन यही है कि हमें कर्म करना है, अपने अंदर के निर्बल को पहचानना है। महाभारत में अलग-अलग समय और जगह का पाठक अपने-अपने धर्मक्षेत्र और कुरुक्षेत्र तलाशता है। रचने वाले और पढ़ने वाले के बीच युद्ध के बाद हर बार जो एक नई महाभारत बनती है वहीं पर साहित्य सार्थक होता है।

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This article was written by kk

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